पापा …

पापा…
पापा वो है
जो अश्को के मोतियो से
खुशियो की माला बनाते है …
ये वो है
जो रेत मिट्टी और पानी से…
एक संसार सजाते है ……

बेशक पापा लोरी नहीं सुनाते,
ना ही आंसू बहाते,
पर
दिन भर की थकान के बावजूद
परिवार के लिये  खुशियां है लाते …

पापा  जब निकलते हैं सुबह तिनको की खोज में,
किसी के खिलौने,
किसी की किताबें,
किसी की मिठाई,
किसी की दवाई,
परवाज़ पर होते हैं घर भर के सपने.…

पापा  कब होते हैं खुद के अपने
जब सांझ ढले लौटते हैं घर,
तब बंद हाथो में…
किसी के सपने कैद होते है …
कभी मां की ख्वाहिश
तो कभी बच्चो की फर्माहिश
होती है ………

सबके सपने साकार होते हैं,
पापा ही है जो बिन मान्गे
हर ख्वाहिश पूरी करते है ……

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Yogesh Ojha

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