कल किसने देखा...

This poem is by our User Priyanshi Chaprot...
आज सीखते हैं अपन जीवन का एक अनोखा लेखा
जिसे महापुरुषों की भाषा में कहते हैं "कल किसने देखा"
होती हे हर किसी के जिवन की शुरुआत आज से
पर पता नही क्यु टाल देता है वो उसे कल पे
कल-कल करते-करते पता नही कहाँ चला जाता है वो पल
जब करनी होती है हमें अपने जीवन की कहीं समस्याएे हल
हर किसी ने सुना है "कल किसने देखा " का कथन
पर बहुत  कम लोगों ने किया हैं इसपें मंथन
यदि नही जुटाएगीं वो किसी काम को  पूरा करने की हिम्मत
और कैसे लिख पाएगी वो खुद अपनी किस्मत
समय की कीमत उस माँ से पूछों जिसनें दौ मिनट की देरी से अपने नवजात शिशु को खोया 
और उस मजदूर से जो भरी ठंड मे तीन रात से कतय नहीं  सोया
उस सैनिक से जिसने पाँच सैकंड़ की दूरी पर अपना देह त्यागा
और उस आदमी से जो पाँच मिनट तक अपनी रैल पकड़ने के लिए  भागा
उस बच्चे की बात भी होगी सबसे अलग
जिसने तीन घंटे परिक्षा के समय एक पल भी नही झपकाई अपनी पलक
यदि हमने सीखा समय को टालना
तो वो हमें सिखा देगा अपनी सफलताएँ टालना
तो भूल के भी कभी मत लगाना घड़ी को ठोकर
क्यौंकि वो तो वापिस खड़ी हो जाएगी हमें धोखा देकर...

Yogesh Ojha

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