आखिर क्युँ मैं उन्हे इतना चाहता हूँ...

जब खुद में मैं खो जाता हूँ..
तब अपने आप से मैं मिल पाता हूँ ...

सवालों के तूफान में मैं घीर जाता हूँ ...
जब कुछ धुंधले चेहरे सामने पाता हूँ...

उस दिन होश में उनसे सामना हो गया ...
सवालों के तूफानों में मैं फिर से खो गया ...

इस बार सवालों के मायने बदल गए ...
खोना था खुद में और हम उनमें खो गए ... 

धीरे धीरे सवाल जवाबों में बेदलने लगे ...
जब परायों के बीच अपनों के चेहरे दिखने लगे ...

खुद में खो कर ही मैंने यह जाना था ...
उनसे मेरा कोई रिश्ता पूराना था ...

अब खुद में खो कर यह एहसास हूआ ...
रिश्ता जो था दिलों का वो आज सरे आम नीलाम हूआ...

अब खुद में खो कर भी खूद को इस सवाल से घीरा पाता हूँ ....
आखिर क्यूँ मैं उन्हे इतना चाहता हूँ ....

Yogesh Ojha

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