Dedicated to DAMINI... May her soul lies in Peace..

अजीब सी कशमकश लिये
यूँ दुनियाँ छोड़ चली थी मैं  ...
ना थी गलती ना था गुनाह
फिर क्यू शिकार थी हुई मैं ..

भगवान की ये रीत थी ऐसी या अल्लाह की थी मर्ज़ी
जिंदगी जीने से पेहले क्यू दुनियाँ छोड़ चली थी  मैं...

थम रही थी साँसें
आखिर कब तक लड़ती मैं खुद से
जब दुनियाँ साथ थी मेरे
तब दुनियाँ छोड़ चली थी मैं...

पर ....

क्यू ज़ाया होगई जो आवज़ उठी थी उस दिन ??
उस आवाज़ के भरोसे ही तो दुनियाँ छोड़ चली थी मैं ...

ना ये दर्द सहेगा अब कोई..
ना रहेगी कोई देह्शत ...
ऐसी ही एक आस लिये दुनियाँ छोड़ चली थी मैं ...

गर तन साथ देता
तो दुनियाँ से लड़ भी लेती मैं ...
किसी की दरिँदगी की खातिर ..
यूँ मुँह मोड़ चली थी मैं...

दूर फलक पर बैठ कर
कुछ यूँ सोच रही थी मैं ...
अब पापा को नाज़ होगा...
और मेरा इंसाफ होगा ...

उम्मीद ना थी की इस दुनियाँ में ऐसा भी होगा ..
मेरी मौत का कुछ ऐसा फलसफा होगा ...
इस देश के इन रिवाजों ने
एक मौत ज़ाया की है ..

मेरे साथ कई नन्ही बच्चियों के आत्म सम्मान को सज़ा दी है...
कैसा होगा भविष्य
क्या लड़कियाँ खेलने के लिये बनी है ...

जब शिकार की उम्र नही देखी जाती ...
तो शिकारी की क्यू देखी गई है ...

मेरे अश्को की क्या खूब कीमत अदा हुई है ....

Yogesh Ojha

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