वीरानियाँ..

रोने दे कुछ पल मुझको

ये आंसू अच्छे लगते है

कभी कभी ये गम के बादल भी

कुछ अपने लगते हैं

हँसना मेरा सबने देखा

जो मेरी पहचान है

पर छुप छुप के हूँ कितना रोया

इस बात से सब अनजान हैं

रात की छाया ले आई जब तन्हाई

उदासी सी कुछ उमड़ आई

सहसा ढलका आँख का पानी

आंसू बन के बहता गया

कोई न यहाँ जग है तन्हा

हैं बस मैं और मेरी तन्हाईयाँ

साथ मेरा देते हैं आंसू

छाईं हैं वीरानियाँ

इन वीरानियों की आदत सी होगई

ख़त्म अब हर ख्वाहिश होगई

देखा पलट कर खुद कॊ जो मैंने

परछाई भी अब गायब सी होगई

ना उम्मीद है ना है कोई सपना

सिर्फ़ एक मैं हूँ खुदका  अपना

खुश हूँ मैं अपने आप में

यही है अब मेरी दुनियाँ

ये वीरानियां...

Yogesh Ojha

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