एक कप चाय !

खुल गई आँखों कि चादर से
गहरे नींदों की सुस्तियाँ ।
कदमों पे होसला बुनते
लिए जाता हुँ दिन की अँगडाइयाँ !

जिम्मेदारी के सिरहाने है कितनी मन्जिलें
हर सवेरा लिखता है यह किस्सा सुहाना ।
तकदीरों से बोलूँ तकलीफें छुपाले
घडी कि हर पहर से है रिश्ता पुराना !

मेहका हुँ, बहका  हुँ कितनी दफा
कितनी ही कोशिशें रह गई बेजुबान ।
फरियादों कि मेहफिल में कदम मिलाए
यादों की उलझनें बेशुमार !

सवेरा भी चल पडा सबके सफर में
मेहनत की डोरियों से ख्वाब जुडने लगे ।
फिर कहीं कुछ साँसें थमने लगी
जैसे खयालों से एतबार करने लगे !

कहीं चाशनी का घोल है
कहीं अदरकी, तो कहीं कडक इतिहास है ।
हर घूँट में है सुकून की चुस्कियाँ
यह एक कप चाय , एक अनगिनत एहसास है !!

Yogesh Ojha

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