क्या लिखूं अब मै,कलम भी खामोश है !!!

कुछ अरमान थे दिल में
जिन्हें पूरा करने निकला था मैं
या यूँ कहूँ
साहिल ना मिले जिस कश्ती को
उसमे चढ़ गया था मैं ...

दौर था एक वो भी
जब नाम का मेरे सिर्फ़ तारीफों का समा था
पर मूक्कदर भी कहाँ झूठ कह रहा था
आज वही शख्श तानों से घिरा था ...

गर मौका मिला
तो पूछूंगा इस दुनियाँ के विधाता से
क्या है कोई ऐसा कानून जो मिल जाए सबको सबकुछ
बिना निराशा के ..

आखिर क्यूँ एक पत्ते के सुखने से
पेड़ को बेकर समझ लेते है
पेड़ तो हमेशा वही होता है
उसे कभी मौसम तो कभी यॆ कमबख्त जज्बात ए इंसान बदल देते है ..

कया लिखूं अब मै
की कलम भी खामोश है
ना है अब कागज़
ना है जज्बात
अब बस अँधेरा चारों ओर है ...

रातों रात किसमत नही बदला करती
सिर्फ़ अपने पराए और लोगों के गुमान बदलते है ....

Yogesh Ojha

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